Sunday, July 14, 2024
अपराध

विकास दुबे मुठभेड़ केस : सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए कमेटी के गठन का इशारा किया

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि विकास दुबे मामले में वो एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति को नियुक्त करने के लिए इच्छुक है जैसा कि पहले हैदराबाद एनकाउंटर केस में किया गया था। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एन सुभाष रेड्डी और जस्टिस ए एस बोपन्ना की पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को भी 10 जुलाई को उत्तर प्रदेश में विकास दुबे और उसके तीन सहयोगियों के कथित एनकाउंटर की सीबीआई निगरानी जांच की मांग की याचिका पर जवाब दाखिल करने का समय दिया।
सीजेआई ने याचिकाकर्ता घनश्याम उपाध्याय से भी कहा कि अदालत जांच को “मॉनिटर” करने के लिए इच्छुक नहीं है। यह उल्लेख करना उचित है कि शीर्ष अदालत ने हैदराबाद पुलिस मुठभेड़ की जांच के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जे वीएस सिरपुरकर के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। एसजी ने अदालत को यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से एक जवाब गुरुवार, 9 जुलाई तक रिकॉर्ड पर आ जाएगा और यह न्यायालय को “संतुष्ट” कर सकता है कि राज्य ने पहले ही पर्याप्त कदम उठाए थे। इस मामले को 20 जुलाई को आगे विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
दरअसल गैंगस्टर विकास दुबे की मुठभेड़ से एक दिन पहले, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उसके पांच सह-अभियुक्तों की “हत्या / कथित मुठभेड़” की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी और इसमें दुबे की संभावित हत्या पर संकेत दिया गया था। दुबे को मध्य प्रदेश से लाकर उत्तर प्रदेश में “उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उसकी मुठभेड़ से बचाने” की आशंका जताते हुए, दलीलों में कहा गया है कि “… इस बात की पूरी संभावना है कि आरोपी विकास दुबे भी उत्तर प्रदेश के अन्य आरोपियों की तरह मारा जाएगा, एक बार उसकी हिरासत उत्तर प्रदेश पुलिस को मिल जाती है।” जबकि याचिका 10 जुलाई को अदालत के सामने सूचीबद्ध नहीं हुई थी, दुबे को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसी तारीख को मार दिया था, जिस दिन यह प्रार्थना की गई थी कि याचिका को सूचीबद्ध किया जाए, क्योंकि वह पुलिस से बचने की कोशिश कर रहा था। इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने बाद में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को सूचित किया कि उसे अपनी याचिका में प्रार्थना में संशोधन करने की अनुमति दी जाए। याचिका में अब सभी आरोपियों की मौत की सीबीआई निगरानी जांच की मांग की गई और पुलिसकर्मियों और उन सभी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को कहा गया है जो पांचों आरोपियों की हत्या में शामिल हैं। “चूंकि, पुलिस द्वारा मुठभेड़ के नाम पर अभियुक्तों की हत्या करना, चाहे वह कितना भी जघन्य अपराधी क्यों न हो, कानून के शासन और मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और यह देश के तालिबानीकरण के समान है और इसलिए तत्काल याचिका दाखिल की गई है।” वकील घनश्याम उपाध्याय ने याचिका दायर की है जिसमें “अभियुक्त विकास दुबे के साथी पांच अभियुक्तों की हत्या / कथित मुठभेड़ की गहन जांच की मांग की गई जो 02 जुलाई को जिला कानपुर में कथित तौर पर आठ पुलिसकर्मियों की हत्या में शामिल थे। जिसे अब कानपुर कांड के नाम से जाना जाता है और जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। आगे यह प्रार्थना की गई है कि इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में केंद्रीय जांच ब्यूरो से कराई जाए। इसके बाद, पुलिसकर्मियों और उन सभी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जो सभी आरोपियों की हत्या में शामिल हैं। याचिका में दुबे की संपत्ति को गिराने और उसके पांच साथियों की कथित हत्या करने के उत्तर प्रदेश पुलिस / प्रशासन के कृत्यों की निंदा की गई है। इसमें लागू प्रावधानों के तहत शामिल पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का प्रयास किया गया है, और उच्चतम न्यायालय द्वारा निगरानी में सीबीआई द्वारा की जाने वाली जांच की मांग की गई है क्योंकि इसमें उच्च पुलिस प्राधिकरण और यूपी सरकार के गृह विभाग और यहां तक ​​कि मंत्री / अधिकारी शामिल हैं। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट से “कानून और संविधान के अंतिम संरक्षक” के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने की अपील करते हुए, पुलिस विभाग और कानून प्रवर्तन मशीनरी में भ्रष्टाचार के रूप में विकास दुबे का उदाहरण दिया गया है, और तेलंगाना एनकाउंटर का मामला भी याद कराया गया है। हाई प्रोफ़ाइल राजनेताओं और पुलिस अधिकारियों के साथ दुबे के संबंध के प्रकाश में, याचिका में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और नियंत्रण में सीबीआई जैसी स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा तत्काल जांच के लिए प्रार्थना की गई है, जबकि यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता को अभियुक्त के लिए कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन पुलिस तंत्र की ओर से पूर्ण अराजकता और अत्यधिक हाई हैंड कार्रवाई को देखकर बहुत तकलीफ हो रही है।