RTI कानून की धज्जियां उड़ा रहे आरा ग्राम पंचायत सचिव विश्राम बिंद: सूचना मांगने पर मढ़ा ‘धन उगाही’ का झूठा आरोप – BBC India News 24
15/08/26
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RTI कानून की धज्जियां उड़ा रहे आरा ग्राम पंचायत सचिव विश्राम बिंद: सूचना मांगने पर मढ़ा ‘धन उगाही’ का झूठा आरोप

जौनपुर (करंजाकला): उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद अंतर्गत विकास खंड करंजाकला की ग्राम पंचायत ‘आरा’ इन दिनों भ्रष्टाचार और प्रशासनिक तानाशाही के चलते सुर्खियों में है। यहाँ तैनात ग्राम पंचायत अधिकारी (VDO) विश्राम बिंद पर आरटीआई (सूचना का अधिकार) कानून का गला घोंटने और सूचना मांगने वाले पर अनर्गल आरोप लगाने के गंभीर आरोप लगे हैं।

RTI कानून की अपनीनई परिभाषागढ़ रहे सचिव

दीपचन्द यादव ने ग्राम पंचायत आरा के विकास कार्यों से संबंधित ऑनलाइन सूचना (संदर्भ संख्या DMOJU/R/2025/60440) मांगी थी। नियमानुसार 30 दिन में सूचना देने के बजाय, सचिव विश्राम बिंद ने आरटीआई अधिनियम की धारा 6(2) को ठेंगे पर रख दिया। सचिव ने अपने जवाब में तर्क दिया कि आवेदक ग्राम पंचायत आरा का निवासी नहीं है, इसलिए उसे सूचना नहीं दी जा सकती। जबकि कानूनन भारत का कोई भी नागरिक देश के किसी भी हिस्से की सार्वजनिक सूचना मांग सकता है।

हवा में भेजी गई सूचना? रसीद दिखाने में फूली सांसें

सचिव विश्राम बिंद की कारगुजारी यहीं नहीं रुकी। उन्होंने दावा किया कि मांगी गई सूचना ‘पंजीकृत डाक’ से भेजी जा चुकी है। जब पत्रकार ने डाक की रसीद, वजन और दस्तावेजों की सूची मांगी, तो विभाग के पास कोई जवाब नहीं था। यह सीधे तौर पर सरकारी रिकॉर्ड के साथ हेराफेरी और उच्चाधिकारियों को गुमराह करने का मामला प्रतीत होता है।

सच दिखाने पर बौखलाहट: लगायाधन उगाहीका घटिया आरोप

जब दीपचन्द यादव ने प्रथम अपील (DMOJU/A/2025/60771) दाखिल की, तो खुद को घिरता देख सचिव ने ‘बचाव ही प्रहार है’ की नीति अपनाते हुए आवेदक पर ही “धन की मांग” करने का संगीन आरोप जड़ दिया। सवाल यह उठता है कि यदि किसी ने धन की मांग की थी, तो सचिव ने अब तक पुलिस में FIR दर्ज क्यों नहीं कराई? क्या यह आरोप केवल सूचना से बचने और आवेदक को डराने के लिए गढ़ा गया एक ‘प्रशासनिक षड्यंत्र’ है?

अज्ञानता या जानबूझकर की गई साजिश?

सचिव के जवाबों ने उनकी कार्यक्षमता और विधिक ज्ञान पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। 10 बिंदुओं के नए आरटीआई आवेदन में दीपचन्द यादव ने अब सचिव की ‘शैक्षणिक योग्यता’ और उनके ‘प्रशिक्षण’ पर ही सवाल उठा दिए हैं। क्षेत्र में चर्चा है कि ग्राम विकास के धन में हुई बंदरबांट को छुपाने के लिए सचिव इस तरह के ओछे हथकंडे अपना रहे हैं।

क्या कहते हैं जानकार?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी आवेदक की ‘क्षेत्रीय स्थिति’ पर टिप्पणी करना और झूठे आरोप लगाना आरटीआई अधिनियम की धारा 20(1) के तहत दंडनीय है। इसमें अधिकारी पर 25,000 रुपये तक का व्यक्तिगत जुर्माना लग सकता है।

आवेदक का कहना है:

“भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरी लड़ाई जारी रहेगी। सचिव विश्राम बिंद ने न केवल सूचना बाधित की है, बल्कि मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रहार किया है। अब यह मामला राज्य सूचना आयोग की चौखट तक जाएगा और दोषी अधिकारी को दंड दिलाकर ही दम लूंगा।” अब देखना यह है कि खण्ड विकास अधिकारी और जिला प्रशासन ऐसे ‘बेलगाम’ सचिव पर क्या कार्यवाही करते हैं या भ्रष्टाचार के इस खेल में मौन सहमति बनी रहेगी।

 

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