The lamp of Urdu literature has been extinguished; with the passing of Tahir Faraz, an entire era has fallen silent. – BBC India News 24
25/07/26
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The lamp of Urdu literature has been extinguished; with the passing of Tahir Faraz, an entire era has fallen silent.

उर्दू अदब का चराग़ बुझ गया, ताहिर फ़राज़ के इंतिक़ाल से एक पूरा दौर ख़ामोश

UTTAR PARDESH

मुल्क की अदबी दुनिया आज गहरे ग़म में डूबी हुई है। उर्दू शायरी को अपनी सादगी, तल्ख़ सच और दर्द भरे एहसासात से नई पहचान देने वाले अज़ीम शायर मोहतरम ताहिर फ़राज़ साहब का इंतिक़ाल न सिर्फ़ एक शख़्स का जाना है, बल्कि उर्दू अदब के एक पूरे दौर का ख़ामोश हो जाना है। उनकी शायरी ने मोहब्बत, जुदाई, तन्हाई और समाजी सचाइयों को जिस बेबाकी से बयान किया, वह उन्हें अपने समकालीन शायरों से अलग मुक़ाम देता है।ताहिर फ़राज़ साहब के फ़न और शख़्सियत को याद करते हुए डॉ. एजाज़ अहमद ने एक भावुक याद साझा की। उन्होंने बताया कि उनकी पहली मुलाक़ात इंदौर में हुई थी। उस मुलाक़ात में उन्होंने अदब की बारीकियों को समझने के इरादे से सवाल किया था—
“शायरी में जान कैसे आती है?”
इस पर ताहिर फ़राज़ साहब ने मुस्कुराते हुए जो जवाब दिया, वही उनकी पूरी शायरी की बुनियाद बन गया—
“दिल में ऐसा ज़ख़्म होना चाहिए, जो कभी न भरे।”

डॉ. एजाज़ अहमद के मुताबिक़ यही जुमला ताहिर फ़राज़ साहब की सोच, तजुर्बे और उनकी रचनात्मक पीड़ा को बयान करता है। वे महज़ अल्फ़ाज़ नहीं लिखते थे, बल्कि अपने भीतर के दर्द को शायरी में ढालकर उसे आम इंसान की आवाज़ बना देते थे। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में ज़िंदगी की सच्चाइयाँ बिना बनावट और बिना लाग-लपेट के नज़र आती हैं। आज उनके इंतिक़ाल से उर्दू अदब में जो ख़ला पैदा हुई है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। आने वाली नस्लें उनकी शायरी से न सिर्फ़ अदबी तालीम लेंगी, बल्कि ज़िंदगी को समझने का सलीक़ा भी सीखेंगी।

 

 

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