Transgender Rights Bill 2026: Amendment Introduced Without Consultation; Protests Intensify Nationwide — Acharya Mahamandaleshwar Kaushalya Nand Giri “Tina Maa” – BBC India News 24
21/04/26

Transgender Rights Bill 2026: Amendment Introduced Without Consultation; Protests Intensify Nationwide — Acharya Mahamandaleshwar Kaushalya Nand Giri “Tina Maa”

ट्रांसजेंडर अधिकार बिल 2026: बिना परामर्श लाया गया संशोधन, देशभर में तेज हुआ विरोध – आचार्य महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरि “टीना मां” (सनातनी किन्नर अखाड़ा)

प्रयागराज,उत्तर प्रदेश –  Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026 को जिस तरीके से लाया गया है, उसने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि सरकार ने इतने संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर न तो नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स से समुचित परामर्श किया और न ही ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की। इसे सीधे-सीधे एकतरफा निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवन, सम्मान और अधिकारों से जुड़ा विषय है। ऐसे में समुदाय की आवाज़ को नजरअंदाज करना न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और गरिमा के अधिकार पर भी चोट है। सवाल उठ रहा है कि जब एक वैधानिक निकाय मौजूद है, तो उसकी भूमिका को दरकिनार कर जल्दबाजी में संशोधन क्यों लाया गया। सनातनी किन्नर अखाड़ा की आचार्य महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरि “टीना मां”ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह कदम पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संवेदनशील मुद्दों पर संवाद से बचकर निर्णय थोपने की प्रवृत्ति अपना रही है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “किसी भी समुदाय के अधिकारों पर फैसला लेते समय उसकी भागीदारी अनिवार्य है, अन्यथा यह अन्याय के समान है।”उन्होंने सरकार से मांग की कि इस संशोधन को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक एवं पारदर्शी संवाद की प्रक्रिया शुरू की जाए। साथ ही यह भी कहा कि अधिकारों की रक्षा कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तविक भागीदारी और संवेदनशील नीतियों से होती है। बढ़ते विरोध के बीच यह मुद्दा अब केवल एक बिल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की परीक्षा बनता जा रहा है। स्पष्ट है कि सम्मान, समानता और न्याय के मूल सिद्धांतों से किसी भी प्रकार का समझौता अब स्वीकार नहीं किया जाएगा।

 

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