नवजात शिशु की देखभाल बेहद नाजुक और जिम्मेदारी भरा कार्य – BBC India News 24
03/02/26
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नवजात शिशु की देखभाल बेहद नाजुक और जिम्मेदारी भरा कार्य

 

नवजात शिशु की देखभाल के लिए मां को इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

नवजात शिशु की देखभाल बेहद नाजुक और जिम्मेदारी भरा कार्य

जौनपुर। मां बनना हर महिला के जीवन का सबसे खास और जिम्मेदारी भरा पल होता है। बच्चे के जन्म के बाद मां पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिशु की देखभाल की होती है। चिकित्सकों के अनुसार जन्म के बाद शुरुआती 28 दिन यानी नवजात अवस्था शिशु के लिए बेहद नाजुक और संवेदनशील होती है। इस दौरान छोटी सी लापरवाही भी शिशु के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। इसलिए मां को हर पल सतर्क रहना जरूरी है।

नवजात शिशु की देखभाल के लिए मां को इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए –”स्तनपान सबसे महत्वपूर्ण” जन्म के तुरंत बाद शिशु को मां का पहला दूध कोलोस्ट्रम अवश्य पिलाना चाहिए। यह शिशु के लिए अमृत समान होता है क्योंकि इसमें जरूरी पोषक तत्व और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। शिशु को पहले छह महीने केवल मां का दूध ही देना चाहिए।जन्म के बाद शिशु के स्वस्थ जीवन की शुरुआत मां के दूध से होती है। चिकित्सकों का कहना है कि मां का पहला दूध यानी कोलोस्ट्रम शिशु के लिए किसी अमृत से कम नहीं है। यह गाढ़ा पीला दूध पोषक तत्वों और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले तत्वों से भरपूर होता है, जो नवजात को कई गंभीर बीमारियों से बचाने में सहायक होता है। कोलोस्ट्रम शिशु की पाचन शक्ति को मजबूत करता है, शरीर में जरूरी एंटीबॉडी प्रदान करता है और उसे संक्रमण से बचाता है। यही कारण है कि जन्म के तुरंत बाद मां को शिशु को स्तनपान कराना चाहिए। चिकित्सक बताते हैं कि जीवन के शुरुआती छह महीने तक बच्चे को केवल मां का दूध ही देना चाहिए। इस अवधि में न तो पानी और न ही कोई अन्य आहार शिशु के लिए आवश्यक होता है। मां के दूध में मौजूद सभी पोषक तत्व बच्चे की वृद्धि और विकास के लिए पर्याप्त होते हैं। स्तनपान से जहां बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास तेजी से होता है, वहीं मां और शिशु के बीच भावनात्मक जुड़ाव भी गहरा होता है। इसके अलावा स्तनपान कराने वाली माताओं को भी कई स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं, जैसे प्रसव के बाद तेजी से स्वास्थ्य सुधार और कुछ गंभीर बीमारियों से सुरक्षा करता है। नवजात को समय पर और नियमित रूप से स्तनपान कराएं। इससे बच्चों में कुपोषण और शिशु मृत्यु दर को कम करने में मदद मिलती है।
“स्वच्छता का ध्यान” नवजात को गोद में लेने से पहले हमेशा हाथ साबुन से धोना चाहिए। शिशु के कपड़े, बिस्तर और लंगोट साफ-सुथरे व सूती कपड़े के होने चाहिए। गंदगी से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

“गर्माहट बनाए रखना” नवजात शिशु का शरीर बहुत जल्दी ठंड पकड़ लेता है। इसलिए उसे हमेशा हल्के और साफ कपड़े पहनाना चाहिए। शिशु को मां की गोद में रखने से उसकी बॉडी टेंपरेचर नियंत्रित रहता है और वह सुरक्षित महसूस करता है।

“नाभि की देखभाल” जन्म के बाद शिशु की नाभि का हिस्सा बहुत संवेदनशील होता है। इसकी साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि नाभि से लालिमा, गंध या पस जैसी समस्या दिखे तो तुरंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए।

“टीकाकरण समय पर कराएं”
जन्म के बाद अस्पताल से जो टीकाकरण शेड्यूल दिया जाता है, उसका पालन करना बहुत जरूरी है। समय पर लगाए गए टीके शिशु को कई खतरनाक बीमारियों से बचाते हैं। टीकाकरण की किसी भी खुराक को छोड़ना या देर करना बच्चे के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि समय-समय पर अस्पताल जाकर बच्चे का टीकाकरण करवाएं और कार्ड में दर्ज कराएं।
माता-पिता की लापरवाही बच्चों को खतरनाक बीमारियों की चपेट में ला सकती है। इसीलिए समय पर टीकाकरण कराना ही बच्चे को सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य देने का सबसे बड़ा साधन है।

“नियमित स्वास्थ्य जांच” शिशु का वजन और स्वास्थ्य समय-समय पर डॉक्टर से जांच करवाना चाहिए। इससे शिशु की सही वृद्धि और विकास का पता चलता है।  “प्यार और स्पर्श” मां का स्नेह, गोद का स्पर्श और त्वचा से त्वचा का संपर्क शिशु के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी है। यह शिशु को सुरक्षा और अपनापन का एहसास कराता है।
यदि शिशु को सांस लेने में कठिनाई, तेज बुखार, दस्त, उल्टी या दूध पीने में समस्या हो तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में लेकर जाना चाहिए। किसी भी तरह की लापरवाही शिशु के जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

संक्षेप में कहा जाए तो नवजात शिशु की देखभाल केवल जिम्मेदारी नहीं बल्कि संवेदनशीलता और धैर्य का विषय है। मां के प्यार और सतर्कता से ही शिशु का भविष्य स्वस्थ और उज्जवल बन सकता है।

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