जौनपुर, 12 जुलाई 2026 जनपद जौनपुर में आज ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत जिले भर में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने फोटो खिंचवाने और वाहवाही लूटने की होड़ में हजारों पौधों का रोपण तो कर दिया, लेकिन इस पूरे अभियान की जमीनी हकीकत सरकारी दावों से कोसों दूर नजर आ रही है।
केवल एक जगह घेराबंदी, बाकी पौधे छुट्टा पशुओं के हवाले?
सरकारी प्रेस नोट के मुताबिक, बदलापुर के विधायक रमेश चंद्र मिश्र ने ग्राम मछली गांव में 500 पौधे लगवाए और उसकी घेराबंदी (ट्री-गार्ड/फेंसिंग) कराई। सच्चाई का दूसरा पहलू यह है कि पूरे जनपद में दर्जनों अन्य जगहों पर—जैसे मछलीशहर, सुजानगंज के बेहलमपुर, मड़ियाहूँ के बल्लीपुर, शाहगंज के दीपाईपुर और सिकरारा के चांदपुर में—भी भारी संख्या में वीआईपी मौजूदगी में पौधे रोपे गए, लेकिन वहां सुरक्षा घेरे या ट्री-गार्ड का कोई उल्लेख नहीं है। जौनपुर में छुट्टा पशुओं (आवारा मवेशियों) की गंभीर समस्या को देखते हुए बिना घेराबंदी के रोपे गए ये हजारों पौधे कुछ ही दिनों में नष्ट होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।
सीड़ा प्राधिकरण और सरकारी विभागों की औपचारिकता
सीड़ा (SIDA) के उत्तरी सेक्टर के पार्क में ‘चरक वन’ के नाम पर औषधीय पौधे लगाए गए और मत्स्य विभाग ने गुर्जर ताल पर नोडल अधिकारी धन लक्ष्मी की मौजूदगी में कार्यक्रम किया। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हर साल ऐसे वीआईपी पार्कों और तालाबों के किनारे मानसून में हजारों पौधे सिर्फ ‘टारगेट’ पूरा करने के लिए रोप दिए जाते हैं, और गर्मी आते-आते पानी के अभाव में सूख जाते हैं। पिछली बार लगाए गए पौधों में से कितने जीवित बचे, इसका कोई ऑडिट रिपोर्ट जनता के सामने नहीं रखा गया।
जफराबाद में अकेले 2050 पौधे, पर जियो-टैगिंग और पानी का क्या?
जफराबाद के विधायक जगदीश नारायण राय द्वारा खटोलिया ग्राम पंचायत में अकेले 2050 पौधे लगाने का दावा किया गया है। इतनी बड़ी संख्या में रोपे गए पौधों को नियमित पानी देने और उनकी निगरानी के लिए वन विभाग या ग्राम पंचायत के पास कोई ठोस मैनपावर या बजट नहीं है। यह सिर्फ एक दिन का जनआंदोलन बनकर रह गया है, जिसके बाद इन पौधों की सुध लेने वाला कोई नहीं होगा।
स्कूलों में बच्चों के कंधों पर जिम्मेदारी, पर इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव
मुंगरा बादशाहपुर के प्राथमिक विद्यालयों (सोहँसा, पुरऊपुर, पाण्डेयपुर) में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) समीर और खंड शिक्षा अधिकारी ने बच्चों से पौधे तो लगवाए और उन्हें ‘सहेजने का संकल्प’ भी दिलाया। लेकिन हकीकत यह है कि जिले के अधिकांश ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों में चारदीवारी (बाउंड्री वॉल) टूटी हुई है या है ही नहीं। ऐसे में मासूम बच्चों द्वारा लगाए गए इन पौधों को छुट्टा पशुओं से बचा पाना नामुमकिन है।
मुख्य बिंदु: अभियान में कहां रह गई कमी?
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सुरक्षा घेरे का अभाव: बदलापुर को छोड़कर किसी भी अन्य विधानसभा या ब्लॉक में पौधों को बचाने के लिए घेराबंदी की ठोस व्यवस्था नहीं दिखाई दी।
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केवल एक दिन का वीआईपी इवेंट: पूर्व मंत्रियों, सांसदों (सीमा द्विवेदी) और विधायकों की मौजूदगी में केवल फोटो खिंचवाने तक सीमित रहा कार्यक्रम।
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सस्टेनेबिलिटी पर सवाल: भारी गर्मी और पानी की कमी के दिनों में इन पौधों को सींचने की कोई दीर्घकालिक योजना प्रशासन के पास नहीं है।
‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की भावना बेशक सराहनीय है, लेकिन जौनपुर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने इसे केवल एक ‘सरकारी इवेंट’ और ‘टारगेट पूरा करने का जरिया’ बना दिया है। जब तक रोपे गए एक-एक पौधे की सुरक्षा और पानी की गारंटी नहीं तय होगी, तब तक यह करोड़ों की लागत वाला वृक्षारोपण महायज्ञ सिर्फ कागजी आंकड़ों में ही हरा-भरा दिखेगा।
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