त्रिवेणी संगम की पावन धरा से गूंजा सनातन धर्म का महाशंखनाद, सनातनी किन्नर अखाड़े के ऐतिहासिक विस्तार ने रचा धर्म, समाज और परंपरा का नया अध्याय – आचार्य महामलेश्वर कौशल्या नंद गिरि (टीना माँ) सनातनी किन्नर अखाड़ा
प्रयागराज
त्रिवेणी संगम की पावन भूमि एक बार फिर सनातन धर्म के इतिहास की साक्षी बनी, जब सनातनी किन्नर अखाड़े के ऐतिहासिक विस्तार की घोषणा के साथ सनातन चेतना का शंखनाद हुआ। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और संतों की उपस्थिति के बीच यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सामाजिक समरसता और सनातन परंपरा के विस्तार का सशक्त संदेश भी लेकर आया। इस ऐतिहासिक अवसर पर आचार्य महामंडलेश्वर कौशल आनंद गिरि, जिन्हें श्रद्धा से टीना माँ कहा जाता है, की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।संगम से हुई इस घोषणा को संत समाज ने सनातन धर्म की अखाड़ा परंपरा में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। संगम, जो स्वयं विभिन्न धाराओं के एकत्व का प्रतीक है, उसी भावना को मूर्त रूप देता दिखाई दिया, जब सनातनी किन्नर अखाड़े के विस्तार का उद्घोष किया गया। यह आयोजन इस बात का प्रमाण बना कि सनातन धर्म केवल परंपरा नहीं, बल्कि समय के साथ समाज को जोड़ने वाली जीवंत चेतना है। सनातन परंपरा में किन्नर समाज का स्थान प्राचीन काल से ही विशिष्ट रहा है। धार्मिक ग्रंथों और इतिहास में किन्नर समाज की उपस्थिति और भूमिका के अनेक उदाहरण मिलते हैं, किंतु सामाजिक उपेक्षा और भ्रांत धारणाओं के कारण यह समाज लंबे समय तक मुख्यधारा से दूर रहा। सनातनी किन्नर अखाड़ा उसी ऐतिहासिक उपेक्षा को समाप्त करने और किन्नर समाज को सनातन धर्म की मूलधारा से सम्मानपूर्वक जोड़ने का प्रयास है। आचार्य महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरि (टीना माँ) के नेतृत्व में यह अखाड़ा निरंतर सशक्त होता जा रहा है। टीना माँ ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन धर्म किसी एक वर्ग, जाति या देह तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म का मूल आधार आत्मा, साधना और आचरण है, न कि बाहरी पहचान। उनके इस वक्तव्य को उपस्थित संतों और श्रद्धालुओं ने गहरे भाव से स्वीकार किया।अखाड़े के विस्तार की घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि इसका उद्देश्य केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक स्तर पर सनातन मूल्यों का प्रसार है। विस्तार के अंतर्गत देश के विभिन्न हिस्सों में नए आश्रमों और पीठों की स्थापना, किन्नर संतों को दीक्षा, वेद-वेदांत, योग, संस्कृत शिक्षा और सनातन परंपराओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ-साथ सामाजिक सेवा, गौसेवा, निर्धन सहायता और धर्म जागरण से जुड़े कार्यक्रमों को भी विस्तार दिया जाएगा। कार्यक्रम में उपस्थित संत-महात्माओं ने सनातनी किन्नर अखाड़े के इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह पहल सनातन धर्म की उस मूल भावना को साकार करती है, जिसमें सभी को समान रूप से स्थान प्राप्त है। संत समाज का मानना है कि इस प्रकार के प्रयास न केवल धार्मिक परंपरा को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि समाज में समरसता और सकारात्मक सोच को भी बढ़ावा देते हैं।संगम तट पर आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साधु-संत और धर्मप्रेमी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में इसे सनातन धर्म की समावेशी सोच का प्रतीक बताया। आयोजन के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय रहा और संगम की लहरों के बीच उठती शंखध्वनि ने इस क्षण को ऐतिहासिक बना दिया।सनातनी किन्नर अखाड़ा आज केवल एक धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का केंद्र बनता जा रहा है। यह अखाड़ा किन्नर समाज को आत्मसम्मान, पहचान और आध्यात्मिक नेतृत्व का अवसर प्रदान कर रहा है। साथ ही यह संदेश भी दे रहा है कि सनातन धर्म में भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है और साधना के मार्ग पर चलने वाला हर व्यक्ति समान रूप से आदरणीय है। टीना माँ के नेतृत्व में अखाड़े ने यह सिद्ध कर दिया है कि किन्नर समाज भी अखाड़ा परंपरा में पूर्ण अधिकार और सम्मान के साथ अपनी भूमिका निभा सकता है। उनके मार्गदर्शन में अखाड़ा न केवल धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय है, बल्कि समाज सेवा और धर्म जागरण के कार्यों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। त्रिवेणी संगम से उठा यह शंखनाद आने वाले समय में सनातन धर्म के विस्तार और सामाजिक समरसता का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बनेगा और यह संदेश देगा कि सनातन धर्म कालातीत, करुणामय और सर्वसमावेशी है। कुल मिलाकर, संगम से हुई यह घोषणा सनातन धर्म के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी। सनातनी किन्नर अखाड़े का यह ऐतिहासिक विस्तार न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला है। आचार्य महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरि (टीना माँ) के नेतृत्व में यह अखाड़ा आने वाले समय में सनातन चेतना को नई दिशा और नई ऊँचाइयाँ देने की क्षमता रखता है।

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