कटिहार (बिहार): बिहार के कटिहार जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पुलिस प्रशासन की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘रक्षक ही भक्षक’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए फलका थाना के एक अनुबंध चालक ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिसिया धौंस दिखाकर अवैध वसूली का खेल रचा, लेकिन जागरूक ग्रामीणों की मुस्तैदी ने इस फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ कर दिया।
मुख्य बिंदु: घटना का पूरा घटनाक्रम
- स्थान: फलका थाना क्षेत्र, मोरसंडा गांव।
- आरोपी: अमन कुमार (थाना चालक), छोटू कुमार, अमित कुमार यादव और ब्रजेश कुमार (फरार)।
- शिकार: राहिल (स्थानीय किराना दुकानदार)।
- आरोप: अवैध नशीली दवाओं का झूठा आरोप लगाकर पैसे ऐंठने की कोशिश।
पटकथा फ़िल्मी, हश्र बुरा
घटना रविवार की बताई जा रही है, जब सफेद रंग की एक निजी गाड़ी में सवार होकर चार युवक मोरसंडा गांव पहुंचे। इनमें से मुख्य आरोपी अमन कुमार फलका थाने में अनुबंध पर चालक के पद पर तैनात था। उसने अपनी वर्दी और पद का दुरुपयोग करते हुए दुकानदार राहिल को डराना शुरू किया। युवकों ने दुकानदार पर कोडीन युक्त सिरप बेचने का मनगढ़ंत आरोप लगाया और उसे जबरन गाड़ी में बिठाने का प्रयास करने लगे।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, आरोपियों की हुई ‘धुनाई’
दुकानदार की चीख-पुकार सुनकर जब बड़ी संख्या में ग्रामीण इकट्ठा हुए, तो आरोपियों के हाव-भाव देखकर लोगों को शक हो गया। ग्रामीणों ने जब कड़ाई से पूछताछ की, तो कथित ‘पुलिसवाले’ बगलें झांकने लगे। इसके बाद आक्रोशित भीड़ ने कानून को हाथ में लेते हुए तीन आरोपियों की जमकर पिटाई कर दी। इस बीच मौका पाकर एक आरोपी ब्रजेश कुमार फरार होने में सफल रहा।
पुलिस और जनता के बीच तीखी नोकझोंक
घटना की सूचना मिलते ही फलका थाना प्रभारी रवि कुमार राय दलबल के साथ मौके पर पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा इस कदर था कि उन्होंने पुलिस की गाड़ी को भी रोकने का प्रयास किया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कोढ़ा सर्किल इंस्पेक्टर उमेश कुमार को हस्तक्षेप करना पड़ा। काफी समझाने-बुझाने के बाद ग्रामीणों ने तीनों आरोपियों को पुलिस के हवाले किया।
“यह बेहद गंभीर मामला है। एक अनुबंध कर्मी द्वारा विभाग की छवि को धूमिल करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और विभागीय जांच के साथ-साथ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।” — प्रशासनिक वक्तव्य
प्रशासन के सामने बड़े सवाल
इस घटना ने बिहार में कानून व्यवस्था के साथ-साथ विभागीय निगरानी पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं:
- भरोसा किस पर? जब थाने से जुड़ा व्यक्ति ही अपराधी बन जाए, तो आम आदमी सुरक्षा की उम्मीद किससे करे?
- अनुबंध कर्मियों की मॉनिटरिंग: क्या थानों में तैनात अनुबंध कर्मियों की गतिविधियों पर आला अधिकारियों की नजर नहीं रहती?
- कानून का खौफ: क्या अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म हो चुका है कि वे सरेआम वर्दी का नाम लेकर डकैती कर रहे हैं?
निष्कर्ष: फिलहाल पुलिस फरार आरोपी की तलाश में छापेमारी कर रही है और पकड़े गए तीनों आरोपियों से पूछताछ जारी है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जनता की जागरूकता ही अपराध के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।
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