Fourth pillar of the nation: Big name, but is the work also the same? – BBC India News 24
08/09/26

Fourth pillar of the nation: Big name, but is the work also the same?

राष्ट्र का चौथा स्तंभ : नाम बड़ा, पर क्या काम भी वैसा ही?

Pratapgarh,Uttarpardesh
लोकतंत्र में पत्रकारिता को राष्ट्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह नाम सुनते ही मन में एक ऐसी संस्था की छवि उभरती है जो निष्पक्ष हो, निर्भीक हो, सत्य के पक्ष में खड़ी हो और जनहित को सर्वोपरि मानती हो। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी यही है कि वह सत्ता और समाज के बीच एक सेतु का कार्य करे तथा जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाए।
जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. अनुराग सक्सेना ने एक गोष्ठी के दौरान अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि
किन्तु जब हम इसकी धरातलीय वास्तविकता को देखने का प्रयास करते हैं तो स्थिति कुछ चिंताजनक दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि आज बहुत कम पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने मूल स्वरूप को बचाए रखने में सफल हैं। यदि अनुमान लगाया जाए तो शायद केवल 20 से 25 प्रतिशत पत्रकारिता ही अपने वास्तविक दायित्वों का निर्वहन कर रही है, वह भी अनेक चुनौतियों और दबावों के बीच।
प्रश्न यह उठता है कि आखिर वह कौन-सा अज्ञात भय है जो राष्ट्र के चौथे स्तंभ को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है? क्या यह राजनीतिक दबाव है? क्या यह आर्थिक निर्भरता है? क्या यह विज्ञापनों की मजबूरी है? या फिर बढ़ते मुकदमों, धमकियों और सामाजिक दबावों का परिणाम है? कारण चाहे जो भी हों, इतना स्पष्ट है कि इन परिस्थितियों ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्रभावित किया है।
आज का पत्रकार कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। एक ओर उसे सत्य सामने लाने का दायित्व निभाना है, तो दूसरी ओर संस्थागत दबावों, आर्थिक असुरक्षा और व्यक्तिगत जोखिमों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसे में अनेक पत्रकार विवश होकर समझौते का मार्ग चुन लेते हैं, जबकि कुछ साहसी पत्रकार तमाम कठिनाइयों के बावजूद सत्य की मशाल जलाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
यह भी सत्य है कि पत्रकारिता का संकट केवल पत्रकारों का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र का संकट है। जब समाचार निष्पक्ष नहीं होंगे, जब जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाएंगे और जब सत्य दबने लगेगा, तब समाज सही दिशा में निर्णय लेने की क्षमता खोने लगेगा। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना केवल मीडिया की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों—सत्य, निष्पक्षता, साहस और जनहित—की ओर पुनः लौटे। साथ ही पत्रकारों को सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे बिना किसी भय या दबाव के अपना कर्तव्य निभा सकें।
राष्ट्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रह सकता है जब उसकी नींव सत्य और स्वतंत्रता पर टिकी हो। यदि यह स्तंभ कमजोर होगा तो लोकतंत्र की पूरी इमारत प्रभावित होगी। इसलिए समय की मांग है कि पत्रकारिता को खोखला करने वाली शक्तियों की पहचान की जाए और उसे पुनः उसकी गरिमा एवं सम्मान के साथ स्थापित किया जाए। तभी चौथा स्तंभ वास्तव में अपने नाम के अनुरूप राष्ट्र और समाज की सेवा कर सकेगा।

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