

जौनपुर। शैक्षिक सत्र 2026-27 के लिए गुरुवार को टाउन हॉल मैदान से जिला स्तरीय ‘स्कूल चलो अभियान’ रैली को मा0 राज्यमंत्री गिरीश चंद्र यादव और जिलाधिकारी सैमुअल पॉल एन. ने हरी झंडी दिखाकर रवाना तो कर दिया, लेकिन इस भव्यता के पीछे बेसिक शिक्षा विभाग की वो कड़वी हकीकत छिप गई जिसे हर साल कालीन के नीचे दबा दिया जाता है। विभाग ने दावा किया है कि अब तक 60 हजार बच्चों का नामांकन हो चुका है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ कागजों पर दाखिला करा देने से जिले की शिक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी?
1200 रुपये में यूनिफॉर्म से लेकर किताब-बैग तक, क्या आज के दौर में यह मज़ाक नहीं?
जिलाधिकारी ने बड़े गर्व से घोषणा की कि डीबीटी (DBT) के माध्यम से बच्चों को 1200 रुपये की धनराशि दी जा रही है, जिससे उन्हें यूनिफॉर्म, जूते, मोजे, स्वेटर और स्कूल बैग खरीदने हैं।
- आज के दौर में जब एक सामान्य स्कूल बैग ही 400 से 500 रुपये का आता है, वहां सरकार उम्मीद कर रही है कि गरीब माता-पिता महज 1200 रुपये में बच्चे को सिर से पैर तक स्कूल के लिए तैयार कर देंगे।
- कई बार यह राशि सत्र खत्म होने के कगार पर पहुंचती है, जिससे गरीब बच्चे महीनों तक बिना यूनिफॉर्म या फटे जूतों में स्कूल जाने को मजबूर होते हैं।
निपुण भारत मिशन और कागजी लक्ष्य का दबाव
राज्यमंत्री ने निपुण भारत मिशन का उल्लेख करते हुए शिक्षकों को समाज की प्रेरक शक्ति बताया। लेकिन हकीकत यह है कि जिले के प्राथमिक विद्यालय शिक्षक इस समय पढ़ाने से ज्यादा ‘डाटा एंट्री ऑपरेटर’ बनकर रह गए हैं।
- आए दिन होने वाले नए-नए ऐप (App) पर हाजिरी, मिड-डे मील की फोटो अपलोड करने और अंतहीन सर्वे के काम ने शिक्षकों को क्लासरूम से दूर कर दिया है।
- जिले के कई स्कूल आज भी ‘एकल शिक्षक’ (सिंगल टीचर) के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में एक अकेला शिक्षक पांच क्लास के बच्चों को ‘निपुण’ कैसे बनाएगा, यह सोचने वाला कोई नहीं है।
रैली की चिलचिलाती धूप और नौनिहालों का पसीना: शहर के वीआईपी रूट (कोतवाली चौराहा, चहारसू, शाही किला, अटाला मस्जिद) पर अधिकारियों और नेताओं की वाहवाही के लिए स्कूली बच्चों को चिलचिलाती धूप और उमस में तख्तियां लेकर टहलाया गया। वीआईपी कल्चर के इस तमाशे में बच्चों की सुरक्षा और सेहत को दांव पर लगाना कहां की समझदारी है?
बुनियादी सुविधाओं का टोटा, कैसे रुकेंगे बच्चे?
60 हजार नए नामांकन का ढोल पीटने वाले अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि:
- जनपद के कितने स्कूलों में आज भी पीने के साफ पानी (हैंडपंप/आरओ) की व्यवस्था नहीं है?
- कितनी बालिकाओं को टूटे हुए और असुरक्षित शौचालयों के कारण स्कूल छोड़ना पड़ता है?
- बिजली कटौती के इस दौर में कितने प्राथमिक विद्यालयों में पंखे और लाइट चालू हालत में हैं? ‘हर बच्चा स्कूल जाए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाए’ का नारा सुनने में बेहद आकर्षक है। लेकिन जब तक जौनपुर के सरकारी स्कूलों से बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों का टोटा और डीबीटी के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरा जैसी व्यवस्था को सुधारा नहीं जाता, तब तक ये भव्य रैलियां और मंत्रियों की हरी झंडियां महज एक सरकारी औपचारिकता और फोटो-अप बनकर रह जाएंगी। दाखिला बढ़ाना आसान है, लेकिन बच्चों को स्कूल में रोक कर रखना और उन्हें सच में शिक्षित करना आज भी एक दूर की कौड़ी है।
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