

जौनपुर, 12 जुलाई 2026
उत्तर प्रदेश सरकार के ‘वृक्षारोपण महायज्ञ-2026’ के तहत जौनपुर में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की शुरुआत बेहद धूमधाम से हुई। करंजाकला के काफरपुर से लेकर पूर्वांचल विश्वविद्यालय तक वीआईपी लोगों ने दीप जलाए, फोटो खिंचवाईं और जनपद में 60,73,400 पौधे लगाने का भारी-भरकम लक्ष्य भी तय कर दिया गया। लेकिन, इस सरकारी उत्साह के पीछे एक कड़वी प्रशासनिक सच्चाई और पिछली नाकामियों का स्याह पहलू भी छिपा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच के अंतर को दर्शाती कुछ मुख्य कमियां निम्नलिखित हैं:
1. लक्ष्य का भारी दबाव और गुणवत्ता से समझौता
जिलाधिकारी और वन विभाग ने जनपद के लिए 60 लाख से अधिक पौधों का लक्ष्य रखा है। सूत्रों और पूर्व के अनुभवों के अनुसार, इतने बड़े लक्ष्य को केवल कुछ दिनों या हफ्तों में पूरा करने के चक्कर में वन विभाग और अन्य संबंधित विभागों पर भारी दबाव रहता है। इस आपाधापी में अक्सर पौधों की गुणवत्ता की अनदेखी होती है। बिना मिट्टी और मौसम के अनुकूलता को परखे, किसी भी तरह के पौधे गड्ढों में डाल दिए जाते हैं, जिससे उनके सूखने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।
2. ट्री-गार्ड और फेंसिंग का न होना: मवेशियों का निवाला बनते पौधे
मुख्य कार्यक्रम स्थल काफरपुर में 1001 पौधे लगाने का दावा किया गया है। लेकिन जनपद के ग्रामीण इलाकों, तहसीलों और सड़क किनारों पर होने वाले व्यापक वृक्षारोपण में सबसे बड़ी कमी फेंसिंग (घेराबंदी) और ट्री-गार्ड की है। बिना सुरक्षा घेरे के लगाए गए इन पौधों को छुट्टा जानवर (मवेशी) कुछ ही दिनों में चर जाते हैं। सरकारी बजट में पौधों को खरीदने का प्रावधान तो होता है, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए मजबूत फेंसिंग की व्यवस्था धरातल पर न के बराबर दिखती है।
3. बजट और जनशक्ति का अभाव: रोपण के बाद कौन देगा पानी?
जिलाधिकारी सैमुअल पॉल एन. ने खुद माना कि “वृक्षारोपण तभी सार्थक होगा जब पौधों का संरक्षण हो।” मगर कड़वा सच यह है कि वन विभाग और ग्राम पंचायतों के पास इतने बड़े पैमाने पर लगाए गए पौधों की नियमित सिंचाई और सुरक्षा के लिए न तो पर्याप्त कर्मचारी (जनशक्ति) हैं और न ही दीर्घकालिक बजट। उमस और भीषण गर्मी के इस मौसम में यदि हफ्ता भर भी पौधों को पानी न मिले, तो वे दम तोड़ देते हैं।
4. जियो-टैगिंग की सुस्त रफ्तार और ‘कागजी’ हरियाली
हर साल करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन उनमें से कितने जीवित बचे, इसका कोई ठोस और पारदर्शी डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाता। हालांकि इस बार भी जियो-टैगिंग के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर तकनीकी लापरवाही और सुस्त रफ्तार के कारण जियो-टैगिंग महज एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। पूर्व के वर्षों में भी लगाए गए लाखों पौधे आज गायब हैं, लेकिन फाइलों में उन्हें ‘जीवित’ दिखा दिया जाता है।
5. केवल ‘विशिष्ट अतिथियों’ तक सीमित भावनात्मक जुड़ाव
‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को भावनात्मक रूप देकर जनता को जोड़ने की कोशिश तो की गई है, लेकिन हकीकत में यह कार्यक्रम अभी भी सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों और वीआईपी संस्कृति के इर्द-गिर्द ही सिमटा है। जब तक आम जनता को गड्ढा खोदने से लेकर पौधे के बड़े होने तक सीधे तौर पर जवाबदेह और जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक वीआईपी लोगों द्वारा लगाए गए पौधे केवल अखबार की सुर्खियों और तस्वीरों तक ही सीमित रहेंगे।
बड़ा सवाल:
सरकारी अमला हर साल जुलाई के महीने में लाखों-करोड़ों पौधे रोपकर अपनी पीठ थपथपा लेता है। लेकिन क्या कोई अधिकारी यह बताने की जहमत उठाएगा कि पिछले वर्षों में लगाए गए पौधों में से कितने आज ‘वृक्ष’ बन पाए हैं? यदि इस बार भी 60 लाख पौधों को लगाने के बाद भगवान भरोसे छोड़ दिया गया, तो यह जनता के टैक्स के पैसे और पर्यावरण के नाम पर किया जाने वाला महज एक ‘कागजी महायज्ञ’ बनकर रह जाएगा।
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