संवाददाता – बी.बी.सी. इंडिया न्यूज़ 24, जौनपुर
जौनपुर, 16 जुलाई, 2025 (विशेष रिपोर्ट)
कृषि विज्ञान केंद्र बक्सा में प्रारंभ हुई हाईटेक नर्सरी को लेकर जिला प्रशासन द्वारा एक बार फिर किसानों को सब्जियों की “स्वस्थ पौध” और “अधिक लाभ” का सपना दिखाया गया है। जिला उद्यान अधिकारी द्वारा प्रचारित इस योजना को किसानों के लिए “वरदान” कहा गया, परंतु जमीनी हकीकत इससे बहुत भिन्न और चिंताजनक है।
योजना का प्रचार बनाम वास्तविकता:
जिला प्रशासन द्वारा जारी विज्ञप्ति में हाईटेक नर्सरी के माध्यम से तैयार किए जा रहे पौधों की गुणवत्ता, उत्पादन वृद्धि और कम लागत के दावे किए गए हैं, किन्तु यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कितने किसानों को अब तक इसका लाभ मिला है, और न ही कोई पारदर्शी सूची प्रकाशित की गई है जिससे योजना के लाभार्थियों की संख्या और चयन प्रक्रिया पर प्रकाश डाला जा सके।
लागत का विवाद और पारदर्शिता का अभाव:
विज्ञप्ति में दो प्रकार की लागतें दर्शाई गई हैं:
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यदि किसान अपना बीज देते हैं, तो लता वर्गीय पौधों हेतु रु0 1.40 तथा क्रूसीफेरी व सोलेनेसी वर्ग हेतु रु0 1.75 प्रति पौधा लागत दर्शायी गई है।
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यदि विभाग स्वयं बीज डालता है, तो लागत क्रमशः रु0 2.70 और रु0 2.00 प्रति पौधा तक बढ़ जाती है।
यह अंतर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि संभावित वित्तीय अपारदर्शिता और लाभ के वितरण में भेदभाव को इंगित करता है। क्या यह अंतर किसानों को आर्थिक शोषण की ओर नहीं धकेलता, विशेषकर उन किसानों को जो बीज देने में सक्षम नहीं हैं?
किसानों के लिए ‘संपर्क सूत्र’ मात्र औपचारिकता?
जिन किसानों के पास मोबाइल फोन या शिक्षा का अभाव है, वे हाईटेक नर्सरी प्रभारी वरुणेश मित्र से संपर्क कैसे कर सकेंगे? क्या विभाग ने ग्राम स्तर पर कोई स्थायी जनसंपर्क तंत्र स्थापित किया है जिससे वंचित और सीमांत किसान भी लाभ ले सकें? इस संबंध में कोई सूचना या कार्ययोजना सामने नहीं रखी गई।
किसान संगठनों की आशंकाएँ:
स्थानीय किसान संगठनों का आरोप है कि हाईटेक नर्सरी जैसी योजनाएँ केवल मीडिया कवरेज और कागज़ी आंकड़ों तक सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक अधिकांश किसानों को इस योजना की जानकारी तक नहीं है, जबकि चयनित लाभार्थी किसानों की सूची विभागीय कार्यालयों में गोपनीय फाइलों में ही दबी रहती है।
प्रशासन की आत्मप्रशंसा से नहीं, परिणामों से होगी सफलता की पहचान:
हाईटेक शब्दावली और आधुनिक कृषि तकनीकों की आड़ में किसानों की मूल समस्याएं—खाद, पानी, मंडी मूल्य निर्धारण, कृषि बीमा, उपज की बिक्री—को दरकिनार किया जा रहा है। जब तक योजनाओं का प्रभाव पारदर्शी, समावेशी और परिणाम केंद्रित नहीं होगा, तब तक इस प्रकार की पहल केवल शाब्दिक सफलता बनकर रह जाएंगी।
निष्कर्ष:
हाईटेक नर्सरी की अवधारणा, यद्यपि वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तम है, परंतु वर्तमान स्वरूप में यह योजना किसानों के हितों की अपेक्षा विभागीय प्रचार की अधिक प्रतीक बनती जा रही है। जवाबदेही, पारदर्शिता और निगरानी के बिना यह पहल किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएगी। समय आ गया है कि न केवल दावे किए जाएं, बल्कि उन्हें आधिकारिक आंकड़ों, स्वतंत्र निगरानी और लाभार्थी फीडबैक से प्रमाणित भी किया जाए।
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