वरिष्ठ विशेष संवाददाता, बी.बी.सी. इंडिया न्यूज 24, जौनपुर
मड़ियाहूं, जौनपुर | 19 जुलाई 2025 — जनपद के मड़ियाहूं तहसील सभागार में जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र की अध्यक्षता तथा पुलिस अधीक्षक डॉ. कौस्तुभ की उपस्थिति में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस भले ही जनसंवाद की एक प्रशासनिक पहल के रूप में प्रचारित हो रहा हो, किंतु प्रस्तुत घटनाक्रम एवं प्रतिवेदन विश्लेषण यह दर्शाते हैं कि समाधान की अवधारणा अभी भी कागजों के दायरे से आगे नहीं बढ़ सकी है।
जहां एक ओर कुल 156 शिकायतें प्राप्त हुईं, वहीं मौके पर मात्र 19 का ही तथाकथित “निस्तारण” होना इस बात का ठोस संकेत है कि समाधान दिवस महज एक औपचारिक मंच बन कर रह गया है — न कि शिकायतों के गुणात्मक, वैधानिक और दीर्घकालिक समाधान का ठोस आधार।
1. सुदनीपुर जल निकासी समस्या: बुनियादी सेवा पर प्रशासनिक ढुलमुल रवैया
सुदनीपुर निवासी द्वारा बरसात में जलनिकासी की विकराल समस्या उठाई गई, जिस पर जिलाधिकारी ने मात्र “खंड विकास अधिकारी को समन्वय कर निस्तारण करने” का निर्देश देकर विषय की गंभीरता को न्यूनतम स्तर पर आंकने का परिचय दिया। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जलनिकासी की विफलता, उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959, तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 6(2)(i) के अंतर्गत एक गंभीर प्रशासनिक विफलता मानी जा सकती है। इस प्रकार की समस्याओं पर त्वरित अभियंत्रण कार्रवाई और बजटीय अनुशंसा अपेक्षित होती है, न कि सिर्फ मौखिक निर्देश।
2. बल्लीपुर तालाब और पेड़ों की अवैध कटान: वन संरक्षण अधिनियम की धज्जियां
ग्राम बल्लीपुर के सिकंदर सिंह की शिकायत — जिसमें ग्राम प्रधान द्वारा तालाब की भूमि तथा भीटा (ग्राम सभा की सार्वजनिक भूमि) के पेड़ों को जेसीबी मशीन से उखाड़कर मृदा का वाणिज्यिक दोहन किया गया — गंभीरतम प्रकार का Forest (Conservation) Act, 1980 तथा उत्तर प्रदेश भू-राजस्व संहिता का घोर उल्लंघन है। जिलाधिकारी द्वारा इस विषय में तहसीलदार, डीएफओ व खंड विकास अधिकारी से मात्र “आख्या” की मांग करना प्रशासनिक शिथिलता का उदाहरण है। यह मामला तत्काल FIR तथा वन अपराध अभियोजन की परिधि में लाया जाना चाहिए था। प्रशासन द्वारा इस आपराधिक प्रकृति की घटना को सर्वेक्षणीय शिकायत मानना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
3. अनुसूचित जाति की भूमि एवं आवास मांग: सामाजिक न्याय की औपचारिकता में कैद
जिलाधिकारी के समक्ष अनुसूचित जाति के व्यक्तियों द्वारा भूमि एवं आवास आवंटन की गुहार — स्वयं इस तथ्य की पुष्टि करता है कि उत्तर प्रदेश भू-आवास योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का निष्पादन सामाजिक न्याय की अवधारणाओं से दूर केवल आंकड़ों तक सीमित रह गया है। जिलाधिकारी द्वारा उपजिलाधिकारी सुनील कुमार को तात्कालिक भूमि आवंटन की कार्यवाही हेतु निर्देश देना एक प्रशंसनीय कथन हो सकता है, किंतु यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पूर्व की पात्रता सूची, सर्वेक्षण रिपोर्ट, एवं भूमि बैंक की उपलब्धता का क्या हुआ? साथ ही, प्रशासन ने यह भी नहीं बताया कि इस लापरवाही के लिए कौन अधिकारी उत्तरदायी होगा और उस पर क्या दंडात्मक कार्यवाही होगी।
4. अवैध चकमार्ग निर्माण और वरासत विवाद: प्रशासनिक तत्परता या दिखावटी सक्रियता?
जितापुर की विमला देवी की भूमि पर चकमार्ग निर्माण और बदौवा के राकेश मिश्रा की वरासत दर्ज न होने की शिकायतों पर संयुक्त जांच या तत्पर खतौनी वितरण की घोषणाएं प्रशासन की कथित संवेदनशीलता का प्रदर्शन मात्र प्रतीत होती हैं। उत्तर प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 2006 के प्रावधानों के अनुसार, वरासत प्रक्रिया समयबद्ध और स्वतः संज्ञान पर आधारित होनी चाहिए — न कि जिलाधिकारी की मौजूदगी में की जाने वाली आपात कार्रवाई का विषय।
5. ‘19 में 156’: समाधान या आंकड़ों का खेल?
जब एक संपूर्ण समाधान दिवस में कुल 156 प्रकरण आए और केवल 19 का ही मौके पर निस्तारण हुआ — तो यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक अक्षमता का प्रदर्शन है। समाधान दिवस का वास्तविक उद्देश्य मात्र शिकायत पंजीकरण नहीं, बल्कि विधिक और स्थायी निवारण होना चाहिए।
निष्कर्ष: क्या
इस आयोजन में जहां जिलास्तरीय अधिकारी उपस्थित रहे, वहीं उनका कार्य केवल “सुनवाई और निर्देश” तक सीमित रहा। विधिक परिप्रेक्ष्य में समाधान तब तक समाधान नहीं माना जा सकता जब तक वह पीड़ित की राहत, दोषियों की जवाबदेही और नीति सुधार की दिशा में क्रियान्वित न हो।
यदि समाधान दिवस केवल एकदिवसीय शो-कॉज फेस्टिवल बनकर रह गया है, तो यह न केवल शासन की प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न है, बल्कि जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का भी अपमान है।
BBC India News 24 wwwbbcindianews24.com