

जौनपुर (जलालपुर), विशेष संवाददाता।
बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जलालपुर विकास खण्ड के कंपोजिट विद्यालय ओइना में आयोजित स्कूल चलो अभियान, स्वच्छता जागरूकता एवं पौधरोपण कार्यक्रम का आयोजन चाहे जितना भव्य और जनोन्मुखी दर्शाया गया हो, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल भिन्न, चिंताजनक और औपचारिकता की खानापूर्ति तक सीमित रही।कार्यक्रम का उद्घाटन बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. गोरखनाथ पटेल द्वारा किया गया। रैली को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया, नारों और स्लोगनों के माध्यम से बच्चों से विद्यालय जाने और स्वच्छता अपनाने की अपील की गई। पौधरोपण भी किया गया और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे भावनात्मक अभियानों से लोगों को जोड़ने का प्रयास हुआ। परंतु, इस समूचे आयोजन की गहराई से पड़ताल करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह सब केवल मीडिया कवरेज और प्रशंसा प्राप्त करने हेतु मंचित एक औपचारिक ‘प्रदर्शन’ मात्र था।
❖ नामांकन अभियान में वास्तविक सहभागिता नगण्य:
शिक्षा विभाग का यह दावा कि “बच्चों के नामांकन व शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी” एक आदर्श स्थिति की कल्पना मात्र है। वास्तविकता यह है कि विद्यालयों में पहले से ही दर्जनभर ऐसे बच्चे हैं जो नामांकित तो हैं, परंतु विद्यालय नहीं आते। रैली के पश्चात भी जिन अभिभावकों से संपर्क का दावा किया गया, उनमें से अधिकांश ग्रामीणों ने बताया कि उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ। कई स्थानों पर केवल फोटो खिंचवाकर ‘दौरा’ संपन्न मान लिया गया।
❖ पौधरोपण: प्रचार की चमक, देखभाल की सच्चाई से दूर
विद्यालय परिसर में पौधारोपण तो किया गया, किंतु पूर्व वर्षों में किए गए पौधारोपण की स्थिति देखना जरूरी है—जहां अधिकतर पौधे देखभाल के अभाव में नष्ट हो चुके हैं। यह अभियान भी उन्हीं चिह्नों पर चलता दिखा: रोपण है, पर पोषण नहीं। फलदार और छायादार पौधे केवल समारोह की शोभा तक सीमित रहे।
❖ स्वच्छता जागरूकता: कैमरे के सामने झाड़ू, पीछे गंदगी
स्वच्छता के नाम पर विद्यालय परिसर में झाड़ू लगाया गया, फोटो खिंचवाए गए, किन्तु यह महज औपचारिकता प्रतीत हुई। कार्यक्रम के कुछ ही घंटों बाद पुनः वही कूड़े-कचरे की स्थिति देखी गई, जो इस बात का प्रमाण है कि जागरूकता का यह प्रयास सतही और क्षणिक था। बच्चों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षक स्वयं अपने व्यवहार से संदेश देने में विफल रहे।
❖ निपुण असेसमेंट की प्रशंसा पर प्रश्नचिह्न
खंड शिक्षा अधिकारी को निपुण असेसमेंट में प्रदेश में शीर्ष स्थान लाने हेतु सम्मानित किया गया, किंतु उस आँकड़े की प्रामाणिकता एवं विधिवत समीक्षा प्रश्नों के घेरे में है। स्थानीय स्तर पर जब विद्यालयों में मूलभूत सुविधाएँ तक सुनिश्चित नहीं हो पाई हैं, तो इस प्रकार की प्रशंसा और पुरस्कार वितरण स्वयं में जांच का विषय होना चाहिए।
❖ निष्कर्ष:
‘स्कूल चलो’, ‘स्वच्छ रहो’ और ‘वृक्ष लगाओ’ जैसे अभियान निःसंदेह जनहित में हैं, किन्तु जब ये अभियान केवल दिखावे और औपचारिकतावश किए जाएँ, तो उनका उद्देश्य खोखला हो जाता है।
शिक्षा विभाग को चाहिए कि वह प्रचार से अधिक परिणाम पर केंद्रित हो, और वास्तविक परिवर्तन लाने हेतु संकल्पबद्ध प्रयास करे। बच्चों की उपस्थिति, पौधों की सुरक्षा और स्वच्छता के व्यवहार को केवल रिपोर्ट में नहीं, बल्कि वास्तविकता में उतारने की जिम्मेदारी तय हो।
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