करंजाकला ब्लॉक में फर्जी “ब्लॉक प्रमुख” द्वारा शासकीय कार्यक्रम में सहभागिता: प्रशासनिक मौन से उठते संविधानिक प्रश्न – BBC India News 24
13/02/26
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करंजाकला ब्लॉक में फर्जी “ब्लॉक प्रमुख” द्वारा शासकीय कार्यक्रम में सहभागिता: प्रशासनिक मौन से उठते संविधानिक प्रश्न

स्थान: जौनपुर | रिपोर्टर: वरिष्ठ संवाददाता
दिनांक: 15 जुलाई 2025

जनपद जौनपुर के विकास खण्ड करंजाकला में एक अत्यंत गंभीर एवं संवेदनशील प्रशासनिक विसंगति प्रकाश में आई है, जिसने न केवल शासन व्यवस्था की वैधानिकता को कठघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि संविधान के मूल अधिकारों और पंचायती राज की लोकतांत्रिक संरचना पर भी गम्भीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

एक शासकीय कार्यक्रम में श्री सुनील यादव उर्फ मम्मन द्वारा स्वयं को “ब्लॉक प्रमुख” के रूप में प्रस्तुत करते हुए मंचासीन होकर फीता काटने, उद्बोधन देने एवं सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में उस पदनाम से संबोधित होने की घटनाएँ सामने आई हैं। उक्त कार्यक्रम में जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारीगण भी उपस्थित रहे, और सरकारी सूचना विभाग द्वारा श्री यादव को “ब्लॉक प्रमुख” कहे जाने की पुष्टि स्वयं प्रेस विज्ञप्तियों एवं छायाचित्रों से होती है।

RTI से उजागर हुआ संवैधानिक उल्लंघन

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों से यह तथ्य स्पष्ट हुआ है कि करंजाकला विकास खण्ड की वैध एवं विधिसम्मत रूप से निर्वाचित ब्लॉक प्रमुख श्रीमती पूनम यादव पत्नी श्री मनोज कुमार यादव हैं। RTI के जवाब में विकास खण्ड अधिकारी द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा ‘मात्रक प्रतिनिधि’ अथवा अन्य अनधिकृत व्यक्ति को अधिकार सौंपने का कोई प्रावधान नहीं है।

इस प्रकार, श्री सुनील यादव द्वारा शासकीय मंच पर “ब्लॉक प्रमुख” की भूमिका में उपस्थित होकर जो कार्य किए गए, वे भारतीय दण्ड संहिता, पंचायत राज अधिनियम तथा संविधान की आत्मा – विशेषकर अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 21 और 243D – का स्पष्ट उल्लंघन हैं।

प्रधानपति संस्कृतिका छद्म विस्तार

विकास खण्डों में महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति अथवा परिजन द्वारा प्रॉक्सी के रूप में सत्ता का उपयोग करना “प्रधानपति संस्कृति” के नाम से कुख्यात हो चुका है। यह प्रवृत्ति न केवल महिला सशक्तिकरण की भावना का अपमान है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों की हत्या के समान है। यह स्थिति Krishna Devi v. State of Bihar [(2017) 4 SCC 394] के निर्णय के प्रतिकूल है, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि “अनधिकृत प्रतिनिधित्व से समस्त प्रशासनिक कृत्य विधि विरुद्ध एवं शून्य माने जाएंगे।”

इसी प्रकार, Union of India v. Association for Democratic Reforms [(2002) 5 SCC 294] में यह स्थापित किया गया कि नागरिकों को यह मौलिक अधिकार प्राप्त है कि वे अपने प्रतिनिधियों की वैधता एवं प्रामाणिकता जान सकें।

प्रशासनिक मौन या परोक्ष सहमति?

इस समग्र प्रकरण में सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि उक्त फर्जी प्रस्तुतिकरण एक सरकारी मंच पर, अधिकारियों की उपस्थिति में हुआ – जिससे यह आशंका और बलवती होती है कि या तो प्रशासन ने इस संवैधानिक उल्लंघन को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया, या फिर वह स्वयं ऐसी विधिविरुद्ध व्यवस्था को प्रश्रय दे रहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि श्री सुनील यादव कौन हैं – प्रश्न यह है कि यदि निर्वाचित नहीं हैं, तो उन्हें मंच और सरकारी पहचान किसने दी? किस अधिकारी ने प्रेस-विज्ञप्ति तैयार की और उसमें अवैध रूप से “ब्लॉक प्रमुख” पदनाम क्यों प्रयुक्त किया?

माँग की गई विधिक कार्यवाहियाँ

इस गंभीर प्रशासनिक प्रकरण को लेकर ज़िले के उत्तरदायी नागरिकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, जिला विकास अधिकारी तथा मण्डलायुक्त वाराणसी को एक विस्तृत शिकायत पत्र प्रेषित किया गया है। उसमें निम्नलिखित विधिक कार्यवाहियों की माँग की गई है:

  1. घटनाक्रम की जाँच हेतु एक स्वतंत्र तथ्यान्वेषी समिति का गठन, जो 15 दिवस के भीतर सार्वजनिक रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
  2. श्री सुनील यादव उर्फ मम्मन के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की उपयुक्त धाराओं के अंतर्गत FIR दर्ज कर विधिक कार्यवाही
  3. झूठी प्रेसविज्ञप्ति जारी करने वाले सूचना विभाग के अधिकारियों की स्वतंत्र जाँच
  4. पिछले तीन वर्षों के समस्त सरकारी कार्यक्रमों की उपस्थिति सूची, व्यय विवरण एवं फोटोग्राफिक अभिलेख की स्वतंत्र लोकजाँच
  5. समस्त विकास खण्डों में यदि इसी प्रकार के छद्म प्रतिनिधित्व की घटनाएँ घटित हुई हैं, तो उनके विरुद्ध स्थायी निर्देश जारी कर ऐसी प्रवृत्तियों पर पूर्ण रोक।

प्रशासनिक चूक या संवैधानिक अपराध?

यह प्रकरण मात्र एक व्यक्ति द्वारा पद के दुरुपयोग का नहीं है, यह लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है। अगर इस प्रकार के “छद्म प्रतिनिधित्व” और “प्रॉक्सी शासन” को प्रश्रय मिलता रहा, तो महिला आरक्षण, चुनाव प्रक्रिया और पंचायती राज जैसे संवैधानिक स्तम्भ केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।

आवश्यक है कि प्रशासन इस पूरे मामले में शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति अपनाते हुए कठोर एवं पारदर्शी कार्रवाई करे। संविधान की गरिमा की रक्षा और जनविश्वास की पुनर्स्थापना हेतु यह परीक्षण की घड़ी है – और इस बार केवल निष्क्रियता नहीं, कार्यवाही की अपेक्षा है।

 

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