जौनपुर/सुरेरी।
एक ओर जहां देश में स्मार्ट सिटी और आदर्श गांवों के निर्माण के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं जौनपुर जनपद के सुरेरी गांव की जमीनी हकीकत इन दावों की सच्चाई को उजागर करती नजर आ रही है। यहां विकास केवल कागजों तक सीमित है, जबकि धरातल पर बदहाली और लापरवाही का आलम है।
ग्राम सभा सुरेरी में बने ग्राम सचिवालय और आंगनवाड़ी केंद्र की स्थिति बेहद चिंताजनक है। इन सरकारी भवनों के मुख्य गेट पर लंबे समय से ताले लटक रहे हैं, जिन पर जंग तक लग चुकी है। यह दृश्य साफ संकेत देता है कि इन संस्थानों का संचालन लंबे समय से ठप पड़ा है। जिन भवनों को ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान और बच्चों व महिलाओं के पोषण के लिए बनाया गया था, वे आज उपेक्षा का प्रतीक बन चुके हैं।
परिसर के अंदर और बाहर गंदगी का अंबार लगा हुआ है। घास-फूस, कचरा और मलबा इस कदर फैला है कि यह किसी सरकारी कार्यालय की बजाय परित्यक्त स्थल जैसा प्रतीत होता है। हैरानी की बात यह है कि यहां न तो सफाईकर्मी की कोई व्यवस्था है और न ही नियमित साफ-सफाई होती है।
सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि जब सचिवालय और आंगनवाड़ी केंद्र बंद पड़े हैं, तो ग्राम प्रधान, ग्राम विकास अधिकारी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन आखिर कैसे कर रहे हैं? यह स्थिति सीधे तौर पर सरकारी नियमों और योजनाओं की अनदेखी को दर्शाती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल वेतन और सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कोई कार्य नहीं हो रहा। इतना ही नहीं, यदि कोई व्यक्ति इस अव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करता है, तो उस पर दबाव बनाया जाता है और उसे धमकियों का सामना करना पड़ता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी की मिलीभगत से ग्राम विकास योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। जनता की समस्याओं का समाधान करना इनके एजेंडे में नहीं है, बल्कि लापरवाही और मनमानी ही इनकी कार्यशैली बन चुकी है।
सरकार भले ही ग्राम स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत हो, लेकिन सुरेरी जैसे गांवों में जिम्मेदारों की उदासीनता इन प्रयासों पर पानी फेर रही है। तस्वीरें खुद इस बदहाल व्यवस्था की गवाही दे रही हैं, जो प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
कितना भी सरकार कोशिश कर ले जनता की हर समस्याओं को उनके ग्राम सचिवालय में निपट जाए तो मजाल है ऐसा ग्राम प्रधान और ग्राम विकास आधिकारी कर दे कदापि नहीं होने देंगे क्यों कि अगर जनता की समस्याओं को निपटाने बैठेंगे तो एसो आराम और भ्रष्टाचार कौन करेगा।
शर्म आती है ऐसे ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी पर जो केवल बोली भाली जानता को गुमराह करते है,
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है, या फिर यह लापरवाही यूं ही जारी रहती है और ग्रामीणों की समस्याएं यूं ही अनसुनी होती रहती हैं।
BBC INDIA NEWS 24
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