लेखक: दीपचन्द यादव
भारत की मिट्टी की खुशबू और यहाँ के लोकतंत्र की असली ताकत हमारे गाँवों में बसती है। ग्राम पंचायत चुनाव महज एक चुनावी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे गाँव के विकास का ‘हृदय’ है। इस बार जब चुनावी चौपालें सज रही हैं, तब कबीर की उस दार्शनिक सोच को राजनीति के धरातल पर उतारने की जरूरत है— “जग मुसाफिर वोट बचा ले।“
वोट की कीमत और बाजार: चुनाव आते ही गाँव की शांति, चुनावी शोर में बदल जाती है। कहीं वादों की झड़ी लगती है, तो कहीं प्रलोभन की चादर बिछाई जाती है। “वोट बचा ले” का सीधा अर्थ है— अपने ईमान को बचा ले। जब एक मतदाता चंद रुपयों, उपहारों या शराब के बदले अपना मत देता है, तो वह वास्तव में अपने बच्चों के स्कूल, अपने घर के सामने की पक्की सड़क और शुद्ध पेयजल के अधिकार को बेच देता है।
जाति–पाति से ऊपर उठकर सोचें: अक्सर पंचायत चुनावों में ‘अपने’ और ‘पराये’ का खेल शुरू हो जाता है। मुसाफिर (मतदाता) को यहाँ यह याद रखना होगा कि जाति का प्रमाण पत्र विकास नहीं लाता, बल्कि योग्यता और विजन लाता है। हमें ऐसा प्रतिनिधि चुनना है जो पंचायत भवन में बैठकर आपकी समस्याओं के लिए लड़े, न कि वह जो केवल अपनी तिजोरी भरे।
पंचायत: आपकी अपनी सरकार: केंद्र और राज्य की सरकारें बड़ी योजनाएं बनाती हैं, लेकिन उन योजनाओं को आपके घर तक पहुँचाने का काम ग्राम प्रधान और वार्ड सदस्यों का होता है। यदि नींव (पंचायत) कमजोर होगी, तो लोकतंत्र की इमारत कभी मजबूत नहीं हो सकती।
मेरा संदेश: मैं, दीपचन्द यादव, आपसे अपील करता हूँ कि इस बार चुनाव में ‘मुसाफिर’ की तरह केवल तमाशा न देखें। एक जागरूक नागरिक बनें। प्रत्याशी से सवाल पूछें, उसके पिछले कार्यों का हिसाब लें और सबसे महत्वपूर्ण— अपना वोट किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपने विवेक से दें।
याद रखिये, चुनाव एक दिन का होता है, लेकिन उसका परिणाम पांच साल (१८२५ दिन) भुगतना पड़ता है।
“वोट तुम्हारा, गाँव तुम्हारा, कल का भविष्य भी है तुम्हारा।“ जागो मतदाता, जागो!
BBC India News 24 wwwbbcindianews24.com